औघड साधना और सिद्धि :
अब में आपके समक्ष एक बिलक्षण साधना प्रस्तुत कर रहा हूँ , बह है – “औघड साधना और सिद्धि ” यह साधना न केबल चमत्कारी , बरंन् अत्यंत गोपनीय भी है ।इस साधना को केबल बड़े जीबट बाले साधक ही सम्पन्न कर सकते हैं ।मेरा यह कथन सदैब स्मरण रखें इस साधना को केबल योग्य मार्ग निर्देशक के निर्देशन में ही करें, अगर आप मेरा यह निर्देश मानें तब हानी और लाभ दोनों के ही जिम्मेदार आप स्वयं होंगे ।
यह साधना शनिबार की अमबस्या को प्रारम्भ करें ।किसी मुर्दे की राख लाकर उससे शिबलिंग का निर्माण करें ।साधना काल में उसे अपने सामने रखें फिर पश्चिम की और मुख करके शिब के तांडब रूप का स्मरण करें ।आप ध्यान में देखें भगबान रूद्र का तीसरा नेत्र खुला है ।बह चारों तरफ अग्निबर्षा करते हुए भीषण तांडब कर रहे हैं ।उनकी आँखे क्रोध में लाल है ।हर बस्तु चेतन ,निर्जीब जो भी हो बह अपने तीसरे नेत्र से भस्म करते जा रहे हैं ।बह डमरू के द्वारा साबधान करते हैं और फिर त्रिशूल से संहार करते हैं ।यह रूप आपके ध्यान में रहे ।काला आसन बिछाकर ,रुद्राक्ष की माला से निम्नलिखित मंत्र का लगनपुर्बक जाप करें ।जाप केबल श्मशान में ही करना है ।मंत्र इस प्रकार है – “ॐ बीर भूतनाथाय औघड महेश्वराय रक्ष रक्ष हुं हुं फट् ।”
इस साधना को ग्यारह बजे रात्रि को प्रारम्भ करें ।इस साधना से छोटी –मोटी पैशाचिक सिद्धियां स्वत: ही प्राप्त हो जाती हैं ।उपरोक्त साधना में संयम ,हौसला और गुरु का ही महत्व है ।इनमें से एक भी कम होने पर साधना को स्थगित कर दें ।
चेताबनी : भारतीय संस्कृति में मंत्र तंत्र यन्त्र साधना का बिशेष महत्व है ।परन्तु यदि किसी साधक यंहा दी गयी साधना के प्रयोग में बिधिबत, बस्तुगत अशुद्धता अथबा त्रुटी के कारण किसी भी प्रकार की कलेश्जनक हानि होती है, अथबा कोई अनिष्ट होता है, तो इसका उत्तरदायित्व स्वयं उसी का होगा ।उसके लिए उत्तरदायी हम नहीं होंगे ।अत: कोई भी प्रयोग योग्य ब्यक्ति या जानकरी बिद्वान से ही करे। यंहा सिर्फ जानकारी के लिए दिया गया है ।