जानें आपकी जन्मकुंडली कौन से लाभकारी योग हैं ..

कुछ भाग्यशाली लोगों की कुंडली में ग्रहों की विशिष्ट स्थिति से कुछ विशेष प्रकार के लाभकारी योग़ बनते है, जो व्यक्ति (जातक) के जीवन पर शुभ, अशुभ व मध्यम प्रभाव डालते हैं । बिभिन्न ज्योतिष ग्रंथों में इन योग़ का विस्तृत वर्णन मिलता है । इन ग्रहीय योगों में कुछ प्रमुख लाभकारी योग़ इस प्रकार हैं :
गजकेशरी योग :
गुरु और चन्द्रमा अगर एक दूसरे के साथ या एक दूसरे से केंद्र स्थान अर्थात 1st , 4th, 7th और 10th स्थान में हो तो गजकेशरी योग़ निर्मित होता है । ये योग़ समाज में एक विशेष प्रतिष्ठा प्रदान करता है, इस योग़ के साथ जन्मे व्यक्ति की ज्ञान अर्जन और अध्ययन की तरफ विशेष रूचि होती है , धार्मिक प्रवृत्ति वाले ये व्यक्ति समाज एवं धर्म के उत्थान की दिशा में वो विशेष कार्य करते है । शहर /समाज या ग्राम के प्रबुद्ध व्यक्तियों में गिने जाने ये लोग आजीविका के रूप में किसी बड़े संस्थान के मुखिया होते है । इस योग़ का फल गुरु और चन्द्र की मजबूती और कुंडली में स्थित प्रमुख ग्रह जैसे लग्न और नवम भाव के स्वामी की मजबूती पर निर्भर करती है ।
चतुःसार योग :
सभी ग्रह चारो केंद्रो में हो तो जातक अत्यधिक धनवान् होता है ।
राज योग :
कर्क राशि मे बृहस्पति, नवें घर में शुक्र, सातवें घर मे मंगल और शनि बैठे हों, तो, जातक राजाओं की भांति सुखी, ऐश्वर्यशाली, प्रतापी, सुखी तथा धनी होता हैं ।
महाराज योग :
आज की परिभाषा में सुख सुविधाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा से पूर्ण जीवन को कुंडली में स्थित राज योग़ का फल कहा जा सकता है, परन्तु उच्च दर्जे का पद, अति विशेष प्रतिष्ठा और सामाजिक व्यवस्था चलाने हेतु शक्तिया अधीन हो तो वो महाराज योग़ कहलाता है ।
जन्म कुंडली में लग्न (1) और पंचम भाव (5) मजबूत स्थिति में हो और भावो के अलावा इन किसी अन्य दुर्भाव के स्वामी ना हो और एक साथ किसी केंद्र या त्रिकोण स्थान में हो ये महाराज योग़ निर्मित होता है , यही परिस्थिति तब भी निर्मित होती है जब आत्मकारक ग्रह (कुंडली में सर्वाधिक अंशों वाला ग्रह) और पुत्रकारक ग्रह (कुंडली में पांचवा सर्वाधिक अंशों वाला ग्रह) मजबूत स्थिति में केंद्र या त्रिकोण स्थिति में हो । इन ग्रहो का नवमांश में नीच की स्थिति में होने पर या छठे , आठवें या बारहवे के स्वामी होने की स्थिति में ये योग़ कमजोर होता है।
शकट योग :
जन्म लग्न कुंडली में यदि चंद्र-गुरू के केन्द्र संबध से गजकेशरी योग़ बन रहा हो, किन्तु लग्न से छटे या आठवे चंद्र या गुरु बैठा हो, तो गजकेशरी योग़ भंग हो कर अशुभ फल दायी शकट योग़ बन जाता हैै । जन्म लग्न से 1-2-4-7-10 भावो में क्रमशः पाप ग्रहो का वास हो तो दरिद्रता सूचक एक योग़ यह भी बनता है ।
धर्मकर्माधिपति योग :
धर्मकर्माधिपति योग़ को ज्योतिषीय ग्रंथो में अत्यन्त महत्वपूर्ण योग़ कहा गया है । इस योग़ के साथ जन्मा व्यक्ति धर्म और समाजसेवा के क्षेत्र में कोई बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य करते हुए किसी सामाजिक संस्था का मुखिया या किसी महत्वपूर्ण पद को प्राप्त करने के साथ विशेष ख्याति अर्जित करता है ।
नवम भाव (9) जन्म कुंडली का धर्म का भाव होता है और दशम भाव (10) कर्म स्थान कहलाता है जब इन दोनों भावो के स्वामी ग्रह एक दूसरे के स्थान परिवर्तन कर रहे हो , या किसी केंद्र और त्रिकोण स्थान में हो या मजबूत स्थिति में एक दूसरे पर दृष्टि डाल रहे हो तब उस परिस्थिति में धर्मकर्माधिपति योग़ निर्मित होता है ।
श्रीनाथ योग :
श्रीनाथ योग़ के साथ जन्मे लोगो पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है, इन ये लोग बहुत ही सुखी वैवाहिक जीवन व्यतीत करते है, संतान सुख प्राप्त होता है और सभी मित्रो और सम्बन्धियों के चहेते होते है । इस योग़ के फलस्वरूप वे बहुत अच्छे वक्ता होते है और लक्ष्मी की भी उनपर विशेष कृपा होती है । सुखी और समृद्ध जीवन के लिए ये योग़ एक महत्वपूर्ण राजयोग है ।
अगर सप्तम (7th House) भाव का स्वामी दशम भाव (10th House) में उच्च की स्थिति में नवम भाव (9th House) के स्वामी के साथ हो तब श्रीनाथ योग निर्मित होता है । योग़ में सम्मिलित ग्रहों के नवमांश में नीच के होने और किसी अन्य दूषित ग्रह की दृष्टि से ये योग़ कमजोर होता है ।
केमद्रुम योग :
जन्म कुंडली में जब चंद्र (चंद्रमा) के आगे-पीछे अर्थात चंद्र से द्रितीय-द्रादश ( सूर्य, राहू, केतु को छोडकर अन्य) कोई भी शुभ या पापग्रह न होने पर केमद्रुम नामक अशुभ योग़ बनता है । यदि चंद्र से द्रितीय-द्रादश, सूर्य-राहू या केतु हो, अन्य कोई ग्रह न हो, तो महान् अशुभी कोई फल दायी योग़ होता है । किन्तु लग्न से चंद्रमा केंद्र मे हो अथवा चंद्रमा से केंद्र में गुरू-शुक्र हो, तो केमद्रुमयोग भंग होकर शुभ फलदायी योग बन जाता है । पंचदशी के प्रयोग से अशुभ फल दुर हो हो जाता है ।
कारिका योग :
सूर्य आदि सातों ग्रह जन्म कुडंली के दसवें तथा ग्यारहवें भाव में हो अथवा लग्न और सप्तम भाव में हो तो जातक यदि नीच कुल में भी जन्मा हो तो भी राजा के समान होता है ।
एकावली योग :
कुंडली में यदि लग्न से अथवा किसी स्थान से प्रारंभ करके क्रम से सात भावो में सातो ग्रह हो तो जातक महाराजा तुल्य होता है ।
हंस योग :
सभी ग्रह मेष, कुभ, धनु, तुला, मकर तथा वृश्चिक राशि में हों, तो जातक चंहु और-से पूजित और सब प्रकार के सुखो एवं एश्वर्य का स्वामी होता है ।
नौका योग :
लग्न से आंरभ करके लगातार सात भावो में सातो ग्रह हो, तो जातक लोग प्रसिद्ध धन-धान्य से युक्त, किन्तु सुख हीन, लोभी और चंचल स्वभाव का होता है ।
चक्र योग :
लग्न से आरंभ करके, एकेक घर को छोडकर अर्थात 1-3-5-7-9-11 भाव में लगातार सातों ग्रहो की स्थित हो, तो जातक पवान्, श्रीमान, प्रतापी तथा एश्र्वय शाली होता है । उसकी कीर्ती समस्त प्रथ्वी पर फैलती है ।
युग योग :
कुंडली के दोनो घरो मे सातो ग्रहो की स्थित हो, तो जो जातक निर्लज्ज, धन, पुत्र, धर्म-कर्म आदि से हीन तथा उचित अनुचित का विचार न करने वाला होता है ।
केदार योग :
कुंडली के चार घरों मे सातों ग्रह की युति हो, तो जामक सत्यवादी, धनी, विजयी, कृतज्ञ, धीर, सदाचारी, चतुर तथा उपकार करने वाले को मानने वाला होता है ।
अनफा योग :
चंद्रमा से बाहरवें स्थान पर गुरू हो, तो जातक सुंदर, स्वरूपवान्, मेघावी, बुद्धिमान्, श्रेष्ठ कवि और यशस्वी लेखक होता है ।
उभयचरी योग :
सूर्य से दूसरे तथा बाहरवें दोनो ही स्थानो पर चंद्रमा को छोउकर कोई अन्य ग्रह स्थित हो, तो जातक कष्ट-सहिष्णुता, समदर्शी, मध्यम शरीर वाला, स्थिर, गंभीर, सतोगुणी, कार्यकुशल, पुष्टग्रीवा वाला सुदंर बहुत-से नौकर रखने वाला, बंधुजनो को आश्रय देने वाला, हष्ट-पुष्ट, भोगी, धनी, उत्साही तथा पूर्णरूप से सुखी होता है ।
चन्द्र – मंगल महालक्ष्मी राज योग :
इस योग़ में जन्मे लोग दबंग किस्म के और बात चीत में स्पष्ट होते है । ये एक सुन्दर धन योग़ भी है ।
विष्णु – लक्ष्मी योग :
केंद्र (1,4, 7, 10) और त्रिकोण स्थान (1 ,5 ,9) के स्वामी ग्रहों का साथ किसी शुभ स्थान मं एकत्रित होना इस योग़ को निर्मित करता है ये योग़ सुखी -प्रतिष्ठित पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन और प्रचुर मात्र में धन उपलभ्ध करता है ।
सिंहासन योग :
नवम या दशम भाव के स्वामी का द्वितीय या लग्न भाव में स्थित होना एक महत्वपूर्ण योग़ है और देश विदेश की यात्रा करने के साथ उच्च पद की प्राप्ति कराता है ।
धन योग :
11वे भाव का 2रे भाव के साथ सम्बन्ध प्रबल धन योग़ होता है , ऐसे लोग अत्यन्त धनि होते है ।
वाहन योग :
शुक्र और चन्द्र का एक साथ चतुर्थ भाव में होना या चतुर्थ भाव पर या उसके स्वामी ग्रह पर दृष्टि देना प्रबल वाहन योग निर्मित करता है , ऐसे लोगो में वाहनो के प्रति विशेष आकर्षण रहता है और वे उनका उपभोग भी करते है ।

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ज्योतिषाचार्य प्रदीप कुमार – 9937207157/ 9438741641 (Call/ Whatsapp)

Acharya Pradip Kumar is the founder of Mystic Shiva Astrology and a practitioner of Vedic astrology with a solution-oriented approach. His work focuses on understanding birth charts as tools for clarity, awareness, and practical decision-making rather than fear-based predictions. Rooted in classical astrological principles and real-life experience, he emphasizes responsible guidance, timing, and conscious remedies aligned with an individual’s life path.

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