मृदुला अप्सरा साधना :
मृदुला अप्सरा साधना कैसे करें ?
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रति अप्सरा साधना :

रति अप्सरा साधना :

रति अप्सरा देबलोक में रहने बाली अति सुन्दर ,अनुपम, अनेक कलाओं में दख्य, तेजस्वी और अलौकिक देबी है । सभी अप्सराओं में यह रति अप्सरा अति सुन्दर अप्सरा की श्रेणी में आती है । सभी अप्सराएं रातरानी, चमेली, रजनीगंधा की गंध से आकर्षित होती हैं । इस रति अप्सरा की साधना में साधक को स्वयं की काम भाबना पर नियंत्रण रखना होता है । जब इस अप्सरा की साधना सम्पन्न हो तो साधक को गुलाब के साथ इत्र भेंट करना चाहिए । यह चमत्कारी शक्तियों से सम्पन्न अप्सरा है, जो साधक के जीबन को परिबर्तित करने की ख्यमता रखती है ।
इस रति अप्सरा की साधना से पहले साधक को अशोक बृख्य के पते ब डालियां लाकर जल से धोकर इस मंत्र से पूजन करें—-
अशोकाय नमस्तुभं कामस्त्री शोकनाशन:
 
अब इन्हें पीत बस्त्र से ढंककर अपने साधना कख्य में रखें । अब पीले चाबल की नौ ढेरियां बनाकर उन पर नौ मोती शंख स्थापित करें । अब सभी कामों का पूजन करें , यथा- १. काम, २. भस्म शरीर, ३. अनंग, ४. मनमथ, ५. बसंत सखा,६. इख्युक, ७. धनुर्धर, ८. कामबाण, ९. पुष्पबाण
 
अब देसी कपूर जलाकर निम्नलिखित मंत्र से पूजन करें …ॐ क्लीं कामाय नम:
फिर गोरोचन चढाकर यह मंत्र पढें….. ॐ क्लीं भस्मशरीराय नम:
गुलाब का इत्र चढाकर यह मंत्र बोलें : ॐ क्लीं अनंगाय नम:
अगरबती जलाकर यह पढें : ॐ क्लीं मन्मथाय नम:
कुमकुम चढाते हुए यह उचारण करें : ॐ क्लीं बसन्तसखाय नम:
आंबला चढाकर यह बोलें : ॐ क्लीं स्मराय नम:
चन्दन चढाकर यह उचारित करें : ॐ क्लीं इखुधनुर्धराय नम:
फिर फूल चढाकर यह कहे : ॐ क्लीं पुष्पषाणाय नम:
अब पल्ल्ब से पूजन करे : ॐ क्लीं कामबाण नम:
अब अपने सामने अशोक बृख्य के पते और माला इस श्लोक को पढकर चढायें :-
सर्ब रत्नमयी नाथ दामिनी बनमालिकाम्।
गृहाण देब पूजार्थ सर्बगन्धमयी बिभो।।
 
अब प्रसाद ब सुपारी भी अर्पित करें । शुध घी का दीप जलाकर सामने रखें । अभिमंत्रित स्फटिक माला से ५१ माला रति अप्सरा मंत्र जप करें । मंत्र जप से पूर्ब संकल्प लें कि “ गणपति ब देबी देबताओं को साखी मानकर मैं रति अप्सरा का आबाहन कर रहा हूँ, बह प्रेमिका या मित्र रूप में दर्शन देकर मेरा आग्रह स्वीकार करें ।“ संकल्प से पूर्ब जल ब पुष्प हाथ में लें ब संकल्प समाप्ति पर उसे धरा पर छोड दें । अब मंत्र जाप प्रारम्भ करें…
 
रति अप्सरा मंत्र : रति अप्सरा कामदेबाय बिद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नो रति प्रचोदयात्।।
यह रति साधना यदि पूर्ण शुध भाबना से की जाये तो इसमें असफलता का कोई औचित्य ही नहीं है । निरन्तर मंत्र जप से नियमों का पालन करके रति अबश्य ही प्रत्यख्य होकर साधक को मनोबांछित बरदान देती है ।

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जय माँ कामाख्या

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