36 Yakshini Sadhana Mantra: नियम, प्रामाणिक सच और 21 सिद्धियाँ
भारतीय तंत्र शास्त्र और डामर तंत्र के गुप्त पन्नों में अलौकिक शक्तियों को जाग्रत करने के कई गहरे रहस्य छिपे हैं। जब जीवन में घोर दरिद्रता, चारों तरफ से विफलता और घोर मानसिक अवसाद घेर लेता है, तब साधक सात्विक शक्तियों का आश्रय लेते हैं।
तंत्र जगत में 36 Yakshini Sadhana Mantra विधा को सबसे प्रखर, ऐश्वर्य प्रदाता और जीवन के समस्त भौतिक सुखों को साकार करने वाली साधना माना गया है। शास्त्रों के अनुसार ये ३६ यक्षिणियाँ कोई तामसिक प्रेत शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि ये उच्च कोटि की दिव्य और सौम्य देवियाँ हैं जो साधक की सच्ची पुकार पर खिंची चली आती हैं। ये सभी सिद्धि प्रदा हैं। यहाँ संक्षेप में इनका विधान प्रस्तुत कर रहा हूँ।
मेरे भाई, एक बात अपने दिमाग में बहुत अच्छे से बिठा लो—नाथ पंथ, शाबर तंत्र या डामर विधा की ये साधनाएं कोई बच्चों का खेल या इंटरनेट का कोई सस्ता खिलौना नहीं हैं।
आज के इस कलयुग में कई भटके हुए लोग बिना किसी नियम-कायदे के, सिर्फ धन-दौलत के लालच में या किसी कुत्सित वासना की पूर्ति के लिए इन उग्र मंत्रों की खोजबीन करते हैं। मैं हमेशा बोलता हूँ कि किसी भी शक्ति को गलत नीयत से, स्वार्थ के लिए या किसी का अहित करने के उद्देश्य से जाग्रत करने का दुस्साहस मत करना। यदि साधक का चरित्र और विचार पवित्र नहीं हैं, तो इन तीव्र मंत्रों का भयंकर उल्टा प्रहार (Backfire) साधक के मानसिक संतुलन को समूल नष्ट कर सकता है।
तांत्रिक गुरु जी की विशेष चेतावनी:
तंत्र शास्त्र के अंतर्गत आने वाली यह अलौकिक यक्षिणी विद्या केवल लोक-कल्याण, साधक की आध्यात्मिक उन्नति, समाज में दरिद्रता का नाश करने और धर्म सम्मत न्यायसंगत उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही ऋषियों द्वारा शास्त्रों में रची गई है। इसका किसी भी प्रकार का मर्यादाहीन, अनैतिक या वासनापूर्ति के लिए उपयोग करना पूरी तरह वर्जित है। यदि कोई साधक गलत नीयत से इन प्रयोगों को आजमाने का दुस्साहस करता है, तो उसे इसके गंभीर मानसिक दुष्परिणाम और कालचक्र का दंड स्वयं भुगतना होगा। यह लेख केवल शास्त्रीय शोध, ज्योतिषीय ज्ञान और जन-जागृति के लिए प्रस्तुत है। किसी भी क्रिया से पूर्व योग्य तांत्रिक गुरु जी या पंडित जी का निर्देशन अनिवार्य है।
अलौकिक यक्षिणी विधा का पौराणिक स्वरूप और सामाजिक मर्यादा
जब हम प्राचीन ग्रंथों, डामर तंत्र और उड्डामरेश्वर तंत्र के इतिहास को देखते हैं, तो यक्षिणी साधना को यक्ष राज कुबेर और भगवान शिव के आशीर्वाद से जुड़ा हुआ माना गया है। कलयुग के इस घोर दौर में जहाँ साधारण मनुष्यों के पास कठिन योग, गुफाओं में वर्षों लंबी तपस्या या कठिन वैदिक यज्ञ करने के लिए समय और सामर्थ्य का घोर अभाव है, वहाँ गृहस्थ जीवन को संकट से बचाने और ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए इन तीव्र विधाओं का आश्रय लिया जाता है।
इस दिव्य विद्या के कड़े नियमों के अनुसार, साधक इन देवियों को माता, बहन, मित्र या पत्नी के रूप में सिद्ध करता है। परंतु, शास्त्रों में माता या बहन के रूप में की गई साधना को ही सबसे उत्तम और सुरक्षित माना गया है। इस प्रयोग के भीतर अनैतिक विचार या काम-वासना का रत्ती भर भी स्थान नहीं होता। यदि साधक के विचार पूरी तरह पवित्र और निष्कपट नहीं हैं, तो यह विधा तुरंत निष्फल हो जाती है, मंत्रों की क्षमता रुष्ट हो जाती है और सिद्धियाँ हमेशा के लिए भंग हो जाती हैं।
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मेरी 15 वर्षों के अनुभव की बात: उज्जैन की एक सच्ची घटना
अपने 15 से अधिक वर्षों के ज्योतिषीय और तांत्रिक मार्गदर्शन के दौरान मेरे आश्रम में कई ऐसे साधक आए, जो अधूरी जानकारी के कारण या बिना गुरु के इन गुप्त विधाओं में उतरकर अपना मानसिक संतुलन खोने की कगार पर आ चुके थे। करीब 5 साल पुरानी बात है, जब मैं मध्य प्रदेश के उज्जैन (Ujjain) शहर में महाकाल मंदिर के समीप एक विशेष गुप्त अनुष्ठान के सिलसिले में रुका हुआ था। वहाँ मुझसे मिलने इंदौर के रहने वाले विकास जी (बदला हुआ नाम) आए थे।
विकास जी का पूरा चलता हुआ व्यापार ठप हो चुका था और वे करोड़ों के कर्ज में डूब चुके थे। निराशा के गहरे अवसाद में आकर उन्होंने बिना किसी गुरु निर्देशन के एक तीव्र यक्षिणी मंत्र का रात में श्मशान में बैठकर जप करना शुरू कर दिया था। इसके कारण उनके घर में अजीब भयानक ध्वनियां, डरावने सपने और घोर मानसिक भय पैदा हो गया था। वे पूरी तरह से रोड पर बैठने की स्तिति में आ चुके थे।
जब मैंने उनकी जन्मकुंडली और गोचर ग्रहों का कड़ा ज्योतिषीय विश्लेषण किया, तो उनके लग्न भाव और अष्टम भाव पर राहु और नीच के मंगल की क्रूर ग्रहण युति देखने को मिला , जिसके कारण Negative Energy की हावी से बुद्धि भ्रमित हो गया था। विकास जी के जीवन बचाने के लिए मैंने उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान किया और साथ साथ डामर तंत्र के अंतर्गत आने वाले सात्विक नियमों को भी गहराई से समझाया।
मैंने उन्हें सात्विक तरीके से महालक्ष्मी और धनदा यक्षिणी का अनुष्ठान करने का सही मार्ग बताया। जब विकास जी ने पूरे संयम, ब्रह्मचर्य और पवित्र भाव से यह प्रयोग पूरा किया, तब जाकर उनके जीवन की सारी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हुई, उनका कर्ज पूरी तरह उतर गया और आज वे पूरे वैभव के साथ अपना सुखी जीवन जी रहे हैं।
36 Yakshini Sadhana Mantra और २१ प्रामाणिक जप विधान
इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए साधक को इसके विशेष समय, पूजा अनुष्ठान और दिशा के कड़े नियमों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। नियमों में की गई ज़रा सी भी लापरवाही या चूक साधना को पूरी तरह निष्फल कर सकती है। शास्त्रों में वर्णित ३६ यक्षिणियों के मूल मंत्र और उनके प्रामाणिक जप विधान नीचे दिए जा रहे हैं:
1. बिचित्र यक्षिणी (Bichitra Yakshini)
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मंत्र: “ॐ बिचित्रे, चित्र्रुपिणी में सिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा ।”
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विधान: वट वृक्ष के नीचे दो लाख जप करें। मधु और घृत मिश्रित चम्पा पुष्पों द्वारा दशांश हवन करें।
2. बिभ्रमा यक्षिणी (Bibhrama Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं बिभ्रमे बिभ्रमाडं रुपे बिभ्रमं कुरु रहिं रहिं भगबति स्वाहा” ।
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विधान: रात्रि में श्मशान में बैठकर दो लाख जप करें। घृत गुग्गुल से दशांश हवन करें। प्रसन्न होकर बिभ्रमा यक्षिणी नित्य पचास व्यक्तियों के पालन हेतु भोजन तथा द्रव्य प्रदान करती हैं।
3. हंसी यक्षिणी (Hanshi Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ द्वी नमो हंसि हंस बाहिनि क्लीं क्लीं स्वाहा ” । b) “हंसि हंसाहाने ह्रीं स्वाहा” ।
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विधान: नगर या ग्राम के एकान्त स्थान में उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। घृत मिश्रित कमल की पंखुड़ियों से दशांश हवन करें। प्रसन्न होकर हंसी यक्षिणी ऐसा अंजन प्रदान करेंगी, जिससे पृथ्वी में छिपे धन को देख सकेंगे। इस साधना से आपके सभी विघ्न दूर होंगे।
4. भीषणी यक्षिणी (Bhishni Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ऐ द्रीं महामोदे भीषणी द्रां द्रां स्वाहा” । b) “ॐ ऐ महानादे भिक्षिणी स्वाहा” ।
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विधान: जहाँ तीन मार्ग मिलते हों अर्थात तिराहें पर आसन लगाकर उक्त मंत्र का एक लाख जप कर घृत युक्त गुग्गुल से दशांश हवन करें। भीषणी यक्षिणी प्रसन्न होकर सभी कामनाएं पूर्ण करेंगी।
5. जनरंजिनी यक्षिणी (Janranjini Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ह्रीं क्लीं जनरंजिनी स्वाहा” । b) “ॐ कलें जनरंजिनी स्वाहा” ।
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विधान: कदम्ब वृक्ष के नीचे रात्रि में उक्त मंत्र का दो लाख जप करें। घृत युक्त गुग्गुल से दशांश हवन करें। यक्षिणी देवी सौभाग्य प्रदान करेंगी।
6. बिशाला यक्षिणी (Bishala Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ऐ ह्रीं बिशाले सत्रा सत्रीं एहोहि स्वाहा” । b) “ॐ ऐ बिशाले हां ह्रीं क्लीं स्वाहा” ।
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विधान: चित्रा वृक्ष के नीचे उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। घृत युक्त कमल पुष्पों से दशांश हवन करें। आकाश गामिनी बिशाला यक्षिणी प्रसन्न होकर दिव्य रसायन प्रदान करेंगी।
7. मदना यक्षिणी (Madana Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ह्रीं मदने madaन बिडम्बिनि आलये सडगमं देहि देहि श्रीं स्वाहा” । b) “ॐ ऐ मदने मदने देबि ममालिंग्य सडेग देहि देहि श्रीं: स्वाहा” ।
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विधान: राज द्वार पर बैठकर उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। दुग्ध मिश्रित चमेली पुष्पों से दशांश हवन करें। मदना यक्षिणी प्रसन्न होकर गुटिका प्रदान करेंगी, जिसे मुख में रखकर अदृश्य हो सकेंगे।
8. घण्टाकर्णि यक्षिणी (Ghantakarni Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ऐ द्रीं पूरीं क्षोभय प्रजा: क्षोभय भगबति गम्भीर स्वने स्वप्रे स्वाहा” । b) “ॐ यक्षिणी आकर्षिर्णी घंटार्ण घंटाकर्ण बिशाले मम स्वप्नं दर्शय दर्शय स्वाहा” । c) “ॐ ऐ पुरं क्षोभय क्षोभय भगति गम्भीर स्वरे कलैं स्वाहा” ।
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विधान: घण्टे को बजाते हुए एकांत में उक्त मंत्र का २० सहस्र जप करें। सारा संसार वशीभूत हो जायेगा।
9. कालकर्णी यक्षिणी (Kaalkarni Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ हुं कालकर्णी ठ: ठ: स्वाहा” । b) “ॐ ल्बें कालकर्णीके ट: ट: स्वाहा” ।
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विधान: इस मंत्र का एक लाख जप कर पलाश की समिधा से मधु के द्वारा दशांश हवन करें। कालकर्णी यक्षिणी प्रसन्न होकर सुख देगी और शत्रु का स्तम्भन करेंगी।
10. महाभया यक्षिणी (Mahabhaya Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ द्रीं महाभये प्रें स्वाहा” । b) “ॐ ह्रीं महाभये हुं फट् स्वाहा” ।
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विधान: मानवास्थि की मुद्राएँ अंगुलियों में धारण कर श्मशान में उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। महाभया यक्षिणी प्रसन्न होकर ऐसा रसायन प्रदान करेंगी, जिसे खाने से अपार बल मिलेगा। सदा युवावस्था ही रहेगी।
11. माहेन्द्री यक्षिणी (Mahendri Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ह्रीं माहेन्द्री मंत्र सिद्धि कुरु कुरु कुलु कुलु हंस: सोहं स्वाहा” । b) “ॐ माहेन्द्री कुलु कुलु हंस: स्वाहा” ।
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विधान: इंद्र धनुष के दिखाई देने पर निर्गुण्डी या तुलसी वृक्ष के नीचे बैठकर उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। माहेन्द्री यक्षिणी प्रसन्न होकर सिद्धि देगी।
12. शंखिनी यक्षिणी (Shankini Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ह्रीं शंखधारिणी शंखधारणे द्रां द्रीं क्लीं श्रीं स्वाहा” । b) “ॐ शंखधारिणी शंखभरने ह्रां ह्रीं क्लीं क्लीं श्रीं: स्वाहा” ।
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विधान: सूर्योदय होने पर शंखमाला में उक्त मंत्र का दश सहस्र जप करें। घृत युक्त कनेर की समिधा से दशांश हवन करें। प्रसन्न होकर शंखिनी यक्षिणी मनोकामना पूर्ण करेगी।
13. श्मशाना यक्षिणी (Shamshaana Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ द्रां द्रीं श्मशान बासिनी स्वाहा” । b) “ॐ हूँ ह्रीं स्फुं श्मशानबासिनि श्मशाने स्वाहा” ।
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विधान: श्मशान में नग्न होकर उक्त मंत्र का चार लाख जप करें। प्रसन्न होकर देवी अंजन प्रदान करेंगी, जिसे लगाने से अदृश्य हो सकेंगे और पृथ्वी में गड़ी निधि को देख सकेंगे। सभी विघ्न दूर होंगे।
14. बट यक्षिणी (Bata Yakshini)
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मंत्र: “ॐ श्रीं द्रीं बटबासिनि यक्षकुल प्रसूते बटयक्षिणी एहोहि स्वाहा” ।
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विधान: तिराहे पर स्थित वट वृक्ष के नीचे रात्रि में मौन होकर उक्त मंत्र का तीन लाख जप करें। प्रसन्न होने पर बट यक्षिणी देवी वस्त्र अलंकार, दिव्य रसों की सिद्धि, रसायन एवं दिव्य अंजन प्रदान करेंगी।
15. मदन मेखला यक्षिणी (Madan Mekhla Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ द्रीं हुं मदन मेखलायै, मदन बिडम्बनायै नम: स्वाहा” । b) “ॐ क्रौं मदनमेखले नम: स्वाहा” ।
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विधान: चौदह दिन तक एक लाख जप करें। मदन मेखला प्रसन्न होकर सिद्ध अंजन प्रदान करेंगी।
16. चन्द्री यक्षिणी (Chandri Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ह्रीं चन्द्रिके हंस: स्वाहा” । b) “ह्रीं चन्द्रिके हंस: क्लीं स्वाहा” ।
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विधान: कृष्ण प्रतिपदा से पूर्णिमा तक जप करें। देवी प्रसन्न होकर साधक को अभीष्ट प्रदान करती है।
17. बिकला यक्षिणी (Bikala Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ बिकले ऐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वाहा” । b) “ॐ बिकले ऐ ह्रीं श्रीं क्लैं स्वाहा” ।
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विधान: पर्वत की निम्न गुफा में बैठकर ३ मास तक उक्त मंत्र का तीन लाख जप करें। बिकला यक्षिणी प्रसन्न होकर मनोकामना पूर्ण करेगी।
18. लक्ष्मी यक्षिणी (Lakshmi Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ऐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मी कमलधारिणी हंस: सोहं स्वाहा” । b) “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्मै नम:” ।
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विधान: वट वृक्ष के पास या अपने घर में बैठकर उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। घृत मिश्रित लाल कनेर एवं दूर्बा से दशांश हवन करें। लक्ष्मी यक्षिणी प्रसन्न होकर रस, रसायन एवं दिव्य भण्डार प्रदान करेंगी।
19. मालिनी यक्षिणी (Malini Yakshini)
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मंत्र: “ॐ द्रीं ॐ नमो मालिनि रित्र एहोहि सुन्दरी हंस हंसि समीहं में सडंगमय स्वाहा” ।
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विधान: चौराहे पर बैठकर उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। मालिनी यक्षिणी प्रसन्न होकर दिव्य खड्ग प्रदान करेगी, जिसके प्रभाव से समस्त शत्रुओं का नाश होगा और निष्कंटक वैभव मिलेगा।
20. शतपत्रिका यक्षिणी (Shatpatrika Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ द्रीं शतपत्रिके द्रीं द्रीं श्रीं स्वाहा” । b) “ॐ hraं शतपत्रिके ह्रां ह्रीं श्रीं स्वाहा” ।
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विधान: कमल पुष्पों के समूह के मध्य बैठकर मों होकर उक्त मंत्र का एक लाख जप करें। घृत युक्त दुग्ध से हवन करें। शत पत्रिका यक्षिणी प्रसन्न होकर पृथ्वी की निधि प्रदान करेंगी।
21. सुलोचना यक्षिणी (Sulochana Yakshini)
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मंत्र: “ॐ द्रीं क्लीं सुलोचना सिद्धि में देहि देहि स्वाहा” ।
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विधान: नदी तट पर बैठकर उक्त मंत्र का तीन लाख जप करें। घृत से दशांश हवन करें। देवी प्रसन्न होकर सिद्ध पादुका प्रदान करेंगी, जिससे इच्छानुसार आकाश में मन एवं पवन के वेग से गमनागमन कर सकेंगे।
22. शोभना यक्षिणी (Shobhna Yakshini)
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मंत्र: “ॐ द्रीं अशोक पल्लब कर तले शोभने श्रीं क्ष: स्वाहा” ।
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विधान: रक्त वस्त्र पहन कर चौदह दिनों तक उक्त मंत्र का जप करें। भोग दायिनी शोभना प्रसन्न होकर सभी कामनाएं पूर्ण करेंगी।
23. कपालिनी यक्षिणी (Kapalini Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ऐ कपालिनी द्रां द्रीं क्लां क्लीं क्लूं कलैं क्लौं क्ल: हंस: सोहं सकलह्रीं फट् स्वाहा” । b) “ॐ ऐ कपालिनी ह्रां ह्रीं क्लीं क्लैं क्लौं हसकहल ह्रीं फट् स्वाहा” ।
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विधान: खीर का भोजन करें और मौन होकर उक्त मंत्र का दो लाख जप करें। प्रसन्न होकर देवी एक कपाल देगी, जिससे आकाश गमन की शक्ति मिलेगी। कपालिनी देवी दूर से ही दर्शन देगी।
24. बिशालिनी यक्षिणी (Bishalini Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ बर यक्षिणी बर यक्ष बिशालिनी आगच्छ आगच्छ प्रियं में भबतु हैमे भब स्वाहा” । b) “ॐ बिरूपाक्ष बिलासिनी आगछागछ ह्रीं प्रिया में भब प्रिया में भब क्लैं स्वाहा” ।
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विधान: नदी तट पर उक्त मंत्र का ५० हजार जप करें। घृत मिश्रित गुग्गुल से दशांश हवन करें। देवी प्रसन्न होकर सौभाग्य प्रदान करेंगी।
25. नटी यक्षिणी (Nati Yakshini)
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मंत्र: “ॐ द्रीं (ह्रीं) नटि, महानटि रूपबति द्रीं स्वाहा” ।
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विधान: अशोक वृक्ष के नीचे चन्दन से मण्डल बनाए। धूप देकर उसमें देवी की पूजा करें। एक महीने तक उक्त मंत्र का जप एकांत में करें। केवल रात्रि में भोजन करें। नटी देवी प्रसन्न होकर रस, अंजन तथा निधि भण्डार प्रदान करेंगी।
26. कामेश्वरी यक्षिणी (Kaameswari Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं आगच्छ कामेश्वरी स्वाहा” ।
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विधान: आसन पर बैठकर पवित्र स्थान में, तीनों संध्याओं में उक्त मंत्र का तीन हजार जप एक मास तक करें। पुष्प, धूप, नैवेद्य और घृत दीपकों के द्वारा रात्रि में देवी की पूजा करें। मंत्र का जप करें। अर्ध रात्रि में देवी आकर रस, रसायन, दिव्य वस्त्र एवं आभूषण प्रदान करेंगी।
27. सुवर्ण-रेखा यक्षिणी (Swarn- Rekha Yakshini)
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मंत्र: “ॐ बर्कर्शाल्मले सुवर्णरेखा स्वाहा” ।
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विधान: कृष्णप्रतिपदा से एकलिंग की पूजा करे। मासांत में रात्रि को विशेष नैवेद्य चढ़ायें। देवी साधक को धन, वस्त्रादि देती है।
28. सुर-सुन्दरी यक्षिणी (Sura-Sundari Yakshini)
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मंत्र: “ॐ आगच्छ सुरसुन्दरी स्वाहा” ।
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विधान: ध्यान व विधि सुरसुन्दरी योगिनी के समान है।
29. मनोहरा यक्षिणी (Manohara Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं सर्बकामदे मनोहरे स्वाहा” ।
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विधान: नदी तट पर रक्त चन्दन से मण्डल बनाएं। देवी की पूजा कर मंत्र का १० सहस्र जप २१ दिनों तक करें। प्रसन्न होकर देवी आधी रात में सहस्र दीनार प्रदान करेंगी, जिन्हें प्रतिदिन व्यय कर देना चाहिए। व्यय न करने पर देवी दीनार पुनः नहीं देगी।
30. प्रमोदा यक्षिणी (Pramoda Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं प्रमादायै स्वाहा” ।
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विधान: अर्ध रात्रि में उक्त मंत्र का सहस्र जप एक मास तक नित्य करें। देवी प्रसन्न होकर निधि का दर्शन करा देगी।
31. अनुरागिणी यक्षिणी (Anuragini Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं अनुरागिणी मैथुन प्रिये यक्ष कुल प्रसूते स्वाहा” ।
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विधान: कुंकुम से भोजपत्र पर देवी का चित्र बनाकर धूप, दीप द्वारा प्रतिपदा तिथि से उसका पूजन आरम्भ करे। पूजा करके प्रतिदिन तीन सन्ध्याओं में उक्त मंत्र का सहस्रा जप एक मास तक करें। प्रसन्न होकर देवी अर्धरात्रि में आकर नित्य सहस्र दीनार प्रदान करेगी।
32. नखकोशिका यक्षिणी (Nakhkoshika Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ह्रीं नख कोशिके स्वाहा” । b) “ॐ नख कोशिके कनकाबति स्वाहा” ।
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विधान: पक्षी गृह (घोंसले) में देवी की पूजा नख और बालों से करे। २१ दिनों तक रात्रि में पूजा कर उक्त मंत्र का जप करें। देवी प्रसन्न होकर आधी रात में आकर मनोकामना पूर्ण करती है।
33. भामिनी यक्षिणी (Bhamini Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं यक्षिणी भामिनि ratiप्रिये स्वाहा” ।
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विधान: तीन दिन तक निराहार रहते हुए चन्द्र या सूर्य ग्रहण के समय स्पर्श से मोक्ष तक देवी का ध्यान करे, और उक्त मंत्र का जप करें। प्रसन्न होकर देवी सिद्ध अंजन प्रदान करेगी, जिससे अंंजित नेत्रोंवाला अदृश्य हो सकेगा और वह पृथ्वी में छिपी निधि को देख सकेगा।
34. पद्मिनी यक्षिणी (Padmini Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं आगच्छ पद्मिनी बल्ल्भे स्वाहा” ।
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विधान: एकलिंग या गृह स्थान में मण्डप बनाकर, कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से पूजन करें। मासांत में रात्रि को विशेष भोग चढ़ावे। देवी साधक को धन, वस्त्र देती है।
35. स्वर्णावती यक्षिणी (Swarnawati Yakshini)
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मंत्र: a) “ॐ ह्रीं आगच्छ स्वर्णाबती स्वाहा” । b) “ॐ आगच्छ कनकाबती स्वाहा” ।
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विधान: बिल्व वृक्ष या वट वृक्ष के नीचे लाल चन्दन से मण्डल बनाए। यक्षिणी की पूजा कर शशक माँस, घृत और खीर का नैवेद्य प्रदान करें। प्रतिदिन उक्त मंत्र का एक हजार जप सात दिनों तक करें। स्वर्णावती प्रसन्न होकर सिद्ध अंजन प्रदान करेंगी, जिससे सारी अदृश्य निधियां देख सकेंगे।
36. धनदा रतिप्रिया यक्षिणी (Dhanada Ratipriya Yakshini)
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मंत्र: “ॐ ह्रीं रतिप्रिया स्वाहा” ।
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विधान: शंख चूर्ण से पुते हुए वस्त्र पर कमल धारिणी, गौरवर्ण और सर्बालंकार युक्ता दिव्य देवी का चित्र बनाए। चमेली के पुष्पों से पूजन करे और एक सप्ताह तक पूजा करते हुए नित्य उक्त मंत्र का एक सहस्र जप करे। देवी प्रसन्न होकर प्रतिदिन अर्धरात्रि में आकर २५ दीनार प्रदान करेंगी।
यक्षिणी साधना के अद्भुत लाभ और ऐश्वर्य का महत्व
इस दिव्य सम्मोहन विधा के चैतन्य होने पर साधक के लौकिक और आध्यात्मिक जीवन के तमाम कड़वे विवाद और आर्थिक तंगी पूरी तरह शांत हो जाते हैं। दूसरों तथा स्वयं की सुख शान्ति चाहने वालों के लिए ही यह ज्ञान दिया गया है। इसमें दिए गये यंत्र, मंत्र तथा तांत्रिक साधनों को पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास के साथ प्रयोग करके आप अपार धन सम्पत्ति, पुत्र पौत्रादि, स्वास्थ्य सुख तथा नाना प्रकार के लाभ प्राप्त करके अपने जीवन को सुखी और मंगलमय बना सकते हैं। इसके प्रभाव से दरिद्रता समूल नष्ट हो जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न १: क्या 36 Yakshini Sadhana Mantra का प्रयोग किसी अनजान या दुर्भावना के उद्देश्य से किया जा सकता है?
उत्तर: बिल्कुल सीधे शब्दों में और कान खोलकर सुन लो मेरे भाई—नहीं। यह डामर तंत्र का कड़ा नियम है कि कोई भी मन्त्र केवल उसी साधक के लिए फलीभूत होता है जिसकी भावना पवित्र हो और जो ब्रह्मांडीय तरंगों के प्रति कृतज्ञ हो। किसी को नुकसान पहुँचाने या वासना की तृप्ति के लिए इसका प्रयोग करना सर्वथा निष्फल और विनाशकारी है।
प्रश्न २: यदि साधना के दौरान विशिष्ट वृक्ष जैसे कदम्ब या चित्रा न मिले, तो क्या करें?
उत्तर: तंत्र मार्ग में सामग्रियों और विशिष्ट स्थानों की शुद्धता का सबसे ज्यादा महत्त्व होता है। शास्त्रों में वर्णित वृक्ष जैसे वट या कदम्ब विशेष रूप से ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आकर्षित करने के लिए ही बताए गए हैं। इसलिए स्थान और नियमों का सही होना अनिवार्य है, अन्यथा प्रयोग अधूरा रह जाएगा।
प्रश्न ३: क्या इस लेख में दी गई किसी भी साधना को बिना गुरु के घर पर सीधे आजमाया जा सकता है?
उत्तर: बिल्कुल सीधे शब्दों में सुन लो—कदापि नहीं। बीज मंत्रों की ऊर्जा बहुत ही प्रखर और उग्र होती है। बिना गुरु के संरक्षण, बिना सुरक्षा कवच के और बिना तांत्रिक गुरु जी से परामर्श लिए इन जटिल प्रयोगों में अपने आप उतरना साधक के मानसिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ सकता है। इसलिए पहले अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाकर उचित मार्गदर्शन प्राप्त करें।
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तंत्राचार्य प्रदीप कुमार – Connect Now on Call/WhatsApp: +91-9438741641
(Bhubaneswar, Odisha)
जय माँ कामाख्या