Prem Sambandh Ke Yog: कुंडली में छिपे ग्रहों के वो गुप्त इशारे, जो तय करते हैं आपकी लव लाइफ और चरित्र का पूरा सच!
भाई, आज मैं (आचार्य प्रदीप कुमार) तंत्र शास्त्र और ज्योतिष का वो सबसे संवेदनशील और गहरा पन्ना खोलने जा रहा हूँ, जिसे जानने के लिए आज की युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा बेचैन रहती है।
हम बात कर रहे हैं जन्म कुंडली में Prem Sambandh Ke Yog की।देखिए भाई, ज्योतिष विद्या के अनुसार ग्रहों का प्रभाव हर किसी की मनोदर्शन और मनोदशा को प्रभावित करता है।
जन्म के समय आकाश मंडल में ग्रहों की जैसी स्थिति होती है, वैसा ही मनुष्य का स्वभाव और उसका चरित्र हो जाता है। जब हम कुंडली में प्रेम, आकर्षण और वासना का विचार करते हैं, तो कुछ खास ग्रहों और घरों की चाल को देखना बहुत ज़रूरी हो जाता है।
Prem Sambandh Ke Yog: जब अंगारक और व्यभिचारी योग ने उजाड़ दी एक हँसती-खेलती जिंदगी
यह बात करीब ४ साल पुरानी है, मेरे पास Gurugram (Haryana) के पास के एक परेशान पिता अपने २4 वर्षीय बेटे की जन्मपत्री लेकर आए थे। लड़का एक संभ्रांत परिवार से था, लेकिन अचानक उसका चरित्र इस कदर बिगड़ा कि वह एक साथ कई गलत संगतों और अवैध संबंधों में पड़ गया। बदनामी के डर से पूरा परिवार रातों की नींद खो चुका था।
जब मैंने उसकी लग्न और नवांश कुंडली का बारीकी से विचार किया, तो देखा कि उसके पहले घर (लग्न) में ही शुक्र और मंगल की तीखी युति बनी हुई थी, जिस पर गुरु देव की कोई दृष्टि नहीं थी। साथ ही सातवें घर में राहु देव मसान की तरह बैठे थे।
यानी कुंडली में Prem Sambandh Ke Yog पूरी तरह से अनियंत्रित होकर व्यभिचारी योग में बदल चुके थे।
मैंने उन्हें स्थिति समझाई और बेटे के हाथ से माँ कामाख्या पीठ के विशेष मंत्रों का अनुष्ठान और शुक्र-मंगल की शांति करवाई। भाई, माँ का चमत्कार देखिये!
६ महीने के भीतर उस लड़के की बुद्धि ठिकाने आई, उसने अपनी पुरानी गलत आदतें छोड़ीं और आज वह अपने पारिवारिक बिजनेस को पूरी प्रतिष्ठा के साथ संभाल रहा है। यह है ग्रहों की चाल को समय पर समझने का असली लाभ!
शुक्र ग्रह: प्रेम और वैवाहिक जीवन का असली राजा
जन्म कुण्डली में शुक्र को प्रेम का कारक ग्रह माना जाता है। यह भौतिक सुखों का कारक भी माना जाता है। शुक्र प्रधान जातक विलासितापूर्ण जीवनशैली का अनुगामी होता है, जबकि शुक्र पर्वत की अनुपस्थिति जातक को वैरागी बना देती है।
शुक्र को वैवाहिक जीवन का कारक भी माना जाता है। जन्म कुण्डली में शुक्र की विभिन्न ग्रहों के साथ युति इसके फलों में विविधता लाती है। आइए जानते हैं शुक्र का बाकी ग्रहों के साथ खेल:
शुक्र + मंगल (व्यभिचारी योग)
शुक्र और मंगल की युति से व्यभिचारी योग का निर्माण होता है। मंगल रक्त, क्रोध और उत्तेजना का कारक ग्रह होता है। यह जिस ग्रह के साथ युति करता है, उस ग्रह से संबंधित गुणों को भड़का देता है।
चूँकि शुक्र प्रेम और वासना का कारक माना जाता है, अतः शुक्र की मंगल के साथ उपस्थिति शुक्र के गुणों को अनियंत्रित कर देती है।
परिणामस्वरूप, कुंडली में इस प्रकार के Prem Sambandh Ke Yog बनने पर जातक अपने जीवन में एक से अधिक या अनेक संबंध बनाता है। वह एक जीवनसाथी से संतुष्ट नहीं रहता है और नये-नये संबंध तलाशता रहता है।
इस युति पर गुरु की पूर्ण दृष्टि या युति हो जाये तो सब कुछ ठीक रहता है, किन्तु गुरु की पूर्ण दृष्टि या युति न हो तो यह योग अशुभ फल देता है।
चूँकि शुक्र प्रेम का कारक ग्रह है और मंगल प्रेम भंग करने वाला ग्रह माना जाता है, अतः इन दोनों के एक साथ होने से प्रेम भंग हो जाता है। वैवाहिक जीवन पर इस युति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
पुनः मंगल और शुक्र नैसर्गिक सम और तात्कालिक शत्रु मिलकर पूर्ण शत्रु बन जाते हैं। इसमें भी यह देख लेना आवश्यक है कि यह युति किस ग्रह के घर में बन रही है:
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गुरु के घर (धनु, मीन): में बन रही है तो अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है।
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बुध के घर (मिथुन, कन्या): में भी इसका प्रभाव न्यून रहता है, कारण कि बुध को नपुंसकता का ग्रह माना जाता है।
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शुक्र (वृष, तुला) या शनि के घर (मकर, कुम्भ): में बन रही हो तो जातक के चरित्र बिगड़ने की अधिक संभावना रहती है।परिणामस्वरूप ऐसा जातक अपने अवैध संबंधों के लिये अपनी प्रतिष्ठा का कोई ध्यान नहीं रखता और शर्म और लज्जा भी उसमें कम होती है, विशेषकर तब जब गुरु और सूर्य भी निर्बल हों।
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यदि गुरु की युति या दृष्टि हो तो गुरु एक बड़ा ग्रह होने के कारण यह सब ढक लेता है, जिससे जातक का चारित्रिक दोष ढक जाता है; क्योंकि कई बार ऐसे संबंध प्रायः दूर के न होकर परिवार के नजदीकी रिश्तों के होते हैं।
व्यभिचारी योग के ही कुछ फल आंशिक रूप से तब भी मिलते हैं जब मंगल और शुक्र का दृष्टि संबंध हो (अर्थात दोनों एक दूसरे से सातवें घर में हों) या मंगल और शुक्र का गृह परिवर्तन योग हो (अर्थात मंगल शुक्र के घर वृष/तुला में और शुक्र मंगल के घर मेष/वृश्चिक में हो)।
यदि मंगल या शुक्र दोनों में कोई वक्री हो तो इसका प्रभाव कम हो जाता है। शुक्र के अस्त होने से या सूर्य के साथ होने से भी इसका प्रभाव कम हो जाता है।
इस योग का प्रभाव पहले, सातवें और ग्यारहवें घर में अधिकतम होता है। छठे घर में न्यूनतम प्रभाव होता है। यदि आठवें या बारहवें घर में हो तो ऐसा जातक अपने अवैध संबंधों के कारण अपयश (बदनामी) प्राप्त करता है।
ग्यारहवें घर में हो तो अवैध संबंध व्यवसायिक और आर्थिक कारणों से या व्यवसायिक और आर्थिक हितों के लिये होते हैं।
मंगल की शुक्र के साथ युति स्वयं मंगल के गुणों के लिये भी अनुकूल नहीं होती है। कारण कि मंगल युद्ध, साहस और वीरता का कारक ग्रह है और इसकी युति स्त्री कारक ग्रह शुक्र के साथ होने पर यह जातक को कायर, भीरु और डरपोक बना सकता है।
निष्कर्षतः: शुक्र और मंगल की युति जन्म कुण्डली में प्रेम और वैवाहिक जीवन के लिये अशुभ होती है। प्रत्येक घर ३० अंश का होता है। एक ही घर में मंगल और शुक्र जितने कम अंश तक पास-पास होते हैं, उतना ही अशुभ फल मिलता है।
शुक्र + राहु (धोखे का योग)
कुण्डली में शुक्र और राहु की युति भी सामान्यतः अशुभ मानी जाती है। राहु का यह गुण है कि यह जिस ग्रह के साथ होता है, उस ग्रह को या उस ग्रह से संबंधित गुणों को दूषित कर देता है।
चूँकि राहु छल-कपट और धोखा देने वाला ग्रह है, अतः यदि शुक्र की युति राहु के साथ हो जाये तो ऐसा जातक प्रेम में धोखा देने वाला होता है तथा स्वयं भी प्रेम में धोखा खाता है।
ऐसे Prem Sambandh Ke Yog जातक को भटकाव की ओर ले जाते हैं और उसका चरित्र भी संदेहास्पद होता है। वह विशाल भवनों, इमारतों और विलासितापूर्ण जीवनशैली की ओर बहुत आकर्षित होता है। वह अधिक से अधिक धन-दौत संचित करने के लिये इच्छुक और प्रयासरत रहता है।
शुक्र + केतु
केतु का यह स्वभाव है कि यह जिस ग्रह के साथ होता है, उस ग्रह की शक्ति को बहुत बढ़ा देता है, कारण कि केतु धड़ भाग है जिसमें सोचने-विचारने की शक्ति नहीं होती है।
केतु जिस ग्रह के साथ युति करता है या जिस ग्रह की दृष्टि में होता है या जिस ग्रह के घर में होता है, उसी के अनुसार फल देता है।
शुक्र की युति केतु के साथ होने की स्थिति में इन दोनों ग्रहों पर राहु की पूर्ण दृष्टि पड़ती है, जिससे शुक्र और राहु की युति के फल भी आंशिक रूप से मिलते हैं। यदि इस युति पर गुरु की पूर्ण दृष्टि या युति हो जाये तो यह शुभ फल देता है।
केतु का यह प्रभाव Prem Sambandh Ke Yog में एक अनूठा रहस्य पैदा करता है।
शुक्र + शनि (मित्रता और सुख)
भाई, जब हम Prem Sambandh Ke Yog के सुखद पहलू को देखते हैं, तो शुक्र और शनि की यह युति शुभ मानी जाती है क्योंकि शुक्र और शनि परस्पर मित्र होते हैं।
यदि शुक्र प्रबल हो अर्थात वृष, मिथुन, तुला, मकर, कुम्भ, मीन राशि का हो और शुभ भाव में हो तो इसके शुभ फल मिलते हैं। साथ ही शुक्र पर शनि का प्रभाव होने से कुछ चारित्रिक दोष हो सकता है। यह युति भौतिक सुखों को दिलाती है।
शुक्र + सूर्य (तेज की कमी)
यदि शुक्र की युति पापग्रह सूर्य के साथ हो तो ये नैसर्गिक शत्रु और तात्कालिक शत्रु मिलकर पूर्ण शत्रु बन जाते हैं।
सूर्य के साथ होने से शुक्र का तेज क्षीण हो जाता है, जिससे शुक्र के प्रभाव और गुणों मे कमी आ जाती है, जो कि Prem Sambandh Ke Yog के आकर्षण को थोड़ा कम कर देता है।”
शुक्र + चन्द्र (विशुद्ध प्रेम)
जन्म कुण्डली में चन्द्र मन का कारक ग्रह माना जाता है। यह विशुद्ध प्रेम का कारक होता है। यदि चन्द्र की युति शुक्र के साथ हो जाये तो ऐसा जातक प्रेम करने वाला, प्रेम में कोमल स्वभाव वाला, मधुर वाणी बोलने वाला, विनोदी, रसिक और कवि होता है।
कुंडली में ऐसे Prem Sambandh Ke Yog जातक के जीवन को रसमय बना देते हैं। कुछ ऐसा ही फल तब भी मिलता है जब शुक्र और चन्द्र का दृष्टि संबंध हो या इनका गृह परिवर्तन योग हो।
शुक्र + गुरु (पवित्र प्रेम)
यदि शुक्र की युति गुरु के साथ हो तो ऐसा जातक पवित्र प्रेम में विश्वास रखता है। ये दोनों ग्रह शुभ और परस्पर शत्रु होते हैं और दो शत्रु ग्रहों की युति से अशुभ फल तथा दो शुभ ग्रहों की युति से शुभ फल मिलता है।
किन्तु यहाँ पर यह देख लेना आवश्यक है कि दोनों मे कौन कितना प्रबल है तथा युति किस भाव मे बन रही है। गुरु की शुभता से Prem Sambandh Ke Yog अत्यंत पवित्र और मर्यादित हो जाते हैं; क्योंकि दोनों में जो प्रबल होता है उसी के अनुसार फल मिलता है। ऐसा जातक अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखता है।
शुक्र + बुध (बुद्धि और प्रेम का तालमेल)
ये दोनों शुभ ग्रह परस्पर मित्र होते हैं, अतः इनकी युति अत्यन्त शुभ होती है। यदि इन दोनों में से कोई एक भी प्रबल हो अर्थात् वृष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, मकर, कुम्भ, मीन राशि का हो तथा किसी शुभ भाव (१, २, ३, ४, ५, ७, ९, १०, ११) में हो तो इनके शुभ फलों में वृद्धि होती है।
ऐसे में यह युति जिस घर में हो और इनसे सातवाँ घर जिस पर शुक्र और बुध की पूर्ण दृष्टि पड़ती है और जिन घरों के ये स्वामी होते हैं, उनसे संबंधित शुभ फल मिलते हैं।
चूँकि बुध ग्रह बुद्धि का कारक होता है, अतः प्रेम के कारक ग्रह शुक्र के साथ इसकी युति हो जाने से जातक प्रेम के क्षेत्र में बहुत सोच-विचार कर कदम रखता है और अपने निजी हितों का ध्यान रखता है और प्रेम में सफल होता है।
भाई, यह तो हुए कुंडली के ग्रह समीकरण। लेकिन अगर आपके प्रेम या वैवाहिक जीवन में इन ग्रहों के कारण भयंकर तबाही मची है, तो जानिए नवग्रहों को शांत करने वाला माँ का वो गुप्त तांत्रिक विधान: [Rashi Ke Anusar Dash Mahavidya: Kaunsi Mahashakti Badlegi Bhagya?]
लग्न कुण्डली, चन्द्र कुण्डली और नवांश कुण्डली में शुक्र की स्थिति जातक के चरित्र की सही जानकारी दे देती है। इनमें शुक्र का ठीक से विश्लेषण कर लेने पर किसी के भी चरित्र के बारे में सही से पता लग जाता है, किन्तु इस पर देश, काल और परिस्थिति का भी प्रभाव पड़ता है।
परन्तु कुछ जन्म कुण्डलियाँ ऐसी भी होती हैं जिनमें शुक्र के निर्दोष होने पर भी चरित्र खराब होता है। ध्यान से देखने पर यह पता चलता है कि यदि सूर्य तुला राशि में नीच का हो और गुरु + राहु का चण्डाल योग हो तो भी चरित्र खराब होता है।
ऐसा इस कारण होता है कि सूर्य प्रतिष्ठा का कारक ग्रह होता है और यदि यह प्रेम और वासना के कारक शुक्र के घर तुला में नीच का हो जाये, तो ऐसा जातक अपने अवैध संबंधों के कारण अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान नहीं रखता और इसे गिरा देता है। साथ ही गुरु + राहु के चाण्डाल योग के कारण नीच और क्रूर कर्मों में आसक्ति होती है।
चाण्डाल योग दो प्रकार का होता है:
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पहला प्रकार: वह जिसमें गुरु निर्बल और राहु प्रबल होता है। यह अत्यन्त अशुभ होता है। ऐसा जातक अपने गुरु को धोखा देता है और पापकर्मों में आसक्ति होती है।
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दूसरा प्रकार: वह जिसमें गुरु प्रबल और राहु निर्बल होता है। ऐसे में गुरु की प्रबलता के कारण धर्म और अध्यात्म में सफल होने लगे, फिर भी राहु के साथ युति के कारण उसे पूरी सफलता नहीं मिल पाती है।
चन्द्र का प्रेम पर प्रभाव
चन्द्र ग्रह भी प्रेम का कारक ग्रह होता है। शुक्र की तरह इसका प्रिय रंग भी श्वेत (सफेद) होता है। यह मन का कारक ग्रह होता है और प्रेम हमेशा मन से होता है। इसी कारण प्रेम के क्षेत्र में चन्द्रमा का महत्वपूर्ण स्थान होता है।
यह सामान्यतः शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की सप्तमी तक प्रबल और कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी तक निर्बल होता है। इसमें भी पूर्णिमा का अति प्रबल और अमावस्या का अति निर्बल होता है।
राशियों में यह सामान्यतः मेष, वृष, कर्क, सिंह, धनु, मीन में प्रबल और मिथुन, कन्या, तुला, वृश्चिक, मकर, कुम्भ में निर्बल होता है। चंद्रमा की यही गतियां कुंडली में Prem Sambandh Ke Yog की गहराई तय करती हैं।
शुभ ग्रहों की राशि (वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, तुला, धनु, मीन) में शुभ और पापग्रहों की राशि (मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर, कुम्भ) में अशुभ फल देता है। यह शुभ ग्रहों के साथ युति करने पर शुभ फल तथा पापग्रहों के साथ युति करने पर अशुभ फल देता है। आइए देखते हैं चन्द्रमा का बाकी ग्रहों के साथ समीकरण:
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चन्द्र + शनि (विष योग): चन्द्रमा की शनि के साथ युति अशुभ फल देती है। ऐसा जातक मानसिक रूप से असंतुलित होता है। मन में नकारात्मक विचार हावी रहते हैं। विवाह में बाधा आती है और विवाह देर से होता है। जीवनसाथी से मनमुटाव हो जाता है। यदि चन्द्र पर शनि की तीसरी, सातवीं या दसवीं पूर्ण दृष्टि पड़ती है तो भी ये सभी फल आंशिक रूप से मिलते हैं। इसमें भी शनि की सातवीं शत्रु दृष्टि अधिक अशुभ होती है। इस युति में शनि और चन्द्र जितने पास-पास होते हैं, उतना ही अधिक अशुभ फल मिलता है और व्यक्ति Prem Sambandh Ke Yog में हमेशा तड़पता रहता है।
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चन्द्र + राहु (ग्रहण दोष): चन्द्रमा की युति राहु के साथ अत्यन्त ही खराब मानी जाती है। यदि एक ही घर में चन्द्र और राहु ९ अंश तक पास हों तो चन्द्र ग्रहण योग का निर्माण होता है। चन्द्रमा जल तत्व का कारक होता है और राहु विष का कारक होता है अतः इनकी युति अशुभ फल देती है। ऐसे दूषित Prem Sambandh Ke Yog जातक को वासना के जाल में फंसा देते हैं। इसी प्रकार यदि सूर्य की युति राहु के साथ हो और दोनों ९ अंश तक पास हों तो सूर्य ग्रहण योग का निर्माण होता है।
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चन्द्र + केतु: केतु धड़ भाग होता है जिसमें सोचने-विचारने की शक्ति नहीं होती है। यह जिस ग्रह के साथ युति करता है उसकी शक्ति को बहुत बढ़ा देता है। इस युति पर राहु की पूर्ण दृष्टि होती है।
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चन्द्र + मंगल (लक्ष्मी योग का उग्र रूप): भाई, कुंडली में Prem Sambandh Ke Yog का एक उग्र रूप चन्द्र और मंगल के मिलन से भी देखा जाता है। इस युति के कारण मन में क्रोध की वृद्धि होती है। वाणी और स्वभाव में कठोरता आती है। ऐसा जातक अपने कार्य में कठोर व्यवहार करता है, साथ ही साथ चन्द्रमा का जल तत्व अग्नि तत्व के मंगल को शांत भी करता है जिससे जातक अधिक कठोर नहीं बन पाता। शुभ स्थिति में होने पर यह युति शुभ फल भी देती है।
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चन्द्र + सूर्य: ये दोनों ग्रह आपस में घनिष्ठ मित्र होते हैं। चन्द्रमा जब सूर्य से १२ अंश आगे जाता है तो एक तिथि बदलती है। चन्द्रमा और सूर्य का एक ही अंश पर मिलन अमावस्या की तिथि को होता है और ३0 अंश के एक घर में चन्द्रमा सूर्य से अधिकतम ३0 अंश की दूरी तक ही हो सकता है। अतः चन्द्रमा जब भी सूर्य के साथ होता है तो वह अमावस्या के आस-पास का ही होता है अर्थात क्षणिक (कमज़ोर) स्थिति में होता है।
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चन्द्र + बुध: ये दोनों शुभ ग्रह परस्पर शत्रु होते हैं फिर भी इनकी युति या दृष्टि संबंध शुभ फलदायी होती है। चन्द्रमा मन और बुध बुद्धि का कारक होता है। इनकी युति से जातक मृदुभाषी, कोमल स्वभाव का, सहृदय, कुशल वक्ता और समझदार होता है। मन और बुद्धि में संतुलन बना रहता है।
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चन्द्र + शुक्र (परम रसिक योग): इनकी युति या दृष्टि संबंध शुभ फलदायी होती है। मन के कारक ग्रह चन्द्रमा का संयोग जब प्रेम के कारक ग्रह शुक्र के साथ हो जाता है तो जातक का मन हमेशा प्रेम के विचारों से भरा रहता है। यदि इन पर किसी पापग्रह विशेषकर शनि या राहु का प्रभाव न हो तो जातक प्रेम में भावनापूर्ण, भावुक, मिलनसार होता है। ऐसे सुंदर Prem Sambandh Ke Yog जातक को एक सच्चा और रसिक प्रेमी बना देते हैं। मस्तिष्क रेखा यदि चन्द्र पर्वत पर चली गयी हो या मस्तिष्क रेखा में से कोई शाखा चन्द्र पर्वत पर जाती हो या चन्द्र पर्वत पर वर्ग या आयत हो तो भी ये सभी गुण मिलते हैं, पर आयु के जिस भाग से ऐसी मस्तिष्क रेखा आयु रेखा से दूर हटने लगती है उस आयु से निराशा हावी होने लगती है। यहाँ पर ध्यान रखने की बात यह है कि ऐसी मस्तिष्क रेखा मणिबन्ध को न छूती हो।
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चन्द्र + गुरु (गजकेसरी योग): जन्म कुण्डली में नवग्रहों के आपसी संयोग से जितनी भी युति बनती है, उन सब में गुरु + चन्द्र की युति सर्वाधिक शुभ होती है। यदि गुरु या चन्द्र प्रबल हो और यह युति किसी शुभ भाव में बन रही हो तो यह जातक को जीवन में काफी ऊँचा उठा देती है। ऐसा जातक दयालु, निष्ठावान, विनम्र, कर्मठ, विश्वासी, आस्थावान, परोपकारी, उदार और ऊँचे विचारों वाला होता है। वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों और विचारों से कोई समझौता नहीं करता है।
केमद्रुम योग (मन की तनहाई)
यदि चन्द्रमा कुंडली में अकेले हो और उसके आगे-पीछे का घर भी खाली हो तो केमद्रुम योग का निर्माण होता है। घरों के खाली होने में राहु-केतु का विचार नहीं किया जाता है; अर्थात यदि चन्द्रमा के साथ या आगे-पीछे के घरों में राहु या केतु हो तो भी केमद्रुम योग लगता है। इस योग में जन्म लेने वाले जातक का मन हमेशा अस्थिर रहता है।
केमद्रुम योग का फल यह होता है कि जातक को आर्थिक प्रतिकूलता का सामना करना पड़ता है, साथ ही वैवाहिक जीवन पर अल्प प्रभाव पड़ता है। ऐसा चन्द्र यदि किसी शुभ ग्रह की राशि में हो तथा उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो केमद्रुम योग का प्रभाव न्यूनतम होता है।
यदि यह चन्द्र किसी पापग्रह की राशि में हो तथा इस पर किसी पापग्रह की दृष्टि हो तो केमद्रुम योग का प्रभाव अधिकतम होता है। यदि इस चन्द्रमा की युति राहु या केतु के साथ हो जाये तो स्थिति और भी खराब हो जाती है, जिससे बने-बनाए Prem Sambandh Ke Yog में मानसिक क्लेश और भटकाव की स्थिति पैदा हो जाती है।
सातवें घर का असली प्रभाव
सातवाँ घर पुरुष की जन्म कुण्डली में पत्नी का घर और स्त्री की जन्म कुण्डली में पति का घर होता है। सातवें घर से ही जीवनसाथी के प्रति असली प्रेम, समर्पण और Prem Sambandh Ke Yog की मज़बूती का पता चलता है। आइए देखते हैं कि सातवें घर में जब अलग-अलग ग्रह बैठते हैं, तो लव लाइफ पर क्या असर होता है:
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सूर्य: यदि सूर्य सातवें घर में हो तो यह लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखता है। सातवें घर में सूर्य हो तो जातक को थोड़े क्रोधी स्वभाव का जीवनसाथी मिलता है, जो Prem Sambandh Ke Yog के आपसी तालमेल में अहंकार का टकराव पैदा करता है।
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चन्द्र: चन्द्र के सातवें घर में होने से विभिन्न स्थितियों में अलग-अलग फल मिलता है। यदि चन्द्रमा सातवें घर में किसी पापग्रह की राशि का हो तथा इस पर किसी पापग्रह की पूर्ण दृष्टि या युति हो तो झगड़ालू स्वभाव का जीवनसाथी मिलता है। किन्तु यदि यह किसी शुभग्रह की राशि का हो तथा इस पर किसी शुभग्रह की पूर्ण दृष्टि या युति हो तो बहुत प्रेम करने वाला जीवनसाथी मिलता है। शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष तथा समसंख्यक और विषमसंख्यक राशियों के अनुसार चन्द्रमा की विभिन्न स्थितियों में अलग-अलग फल होते हैं।
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मंगल (मांगलिक दोष): सातवें घर में मंगल का होना अशुभ होता है। ऐसे में जन्म कुण्डली प्रबल मंगली (मांगलिक) हो जाती है। मंगली होने की अन्य स्थितियों में तो मंगल केवल पूर्ण दृष्टि से सातवें घर को देखता है, किन्तु सातवें घर में होने पर इसका सीधा अशुभ प्रभाव वैवाहिक जीवन पर पड़ता है। परिणामस्वरूप ऐसा मंगल वैवाहिक जीवन के लिये अशुभ फलदायी होता है। इस मंगल पर यदि किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि या युति हो जाये तो इसके अशुभ फलों में और वृद्धि हो जाती है, किन्तु यदि इस मंगल पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि या युति हो तो इसके अशुभ फलों में कमी आती है।
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बुध: सातवें घर में बुध की स्थिति से बुद्धिमान और विनम्र जीवनसाथी मिलता है। बुध जन्म लग्न पर पूर्ण दृष्टि डालता है जिससे ऐसा जातक आकर्षक व्यक्तित्व का होता है। वह बहुत सोच-विचारकर प्रेम करता है। जीवनसाथी से भरपूर प्रेम मिलता है। किन्तु यदि इस बुध की युति किसी पापग्रह के साथ हो जाये तो यह अशुभ फल भी दे सकता है। बुध का यह स्वभाव Prem Sambandh Ke Yog में बुद्धिपरक चालाकी भी ला सकता है। कारण कि बुध का यह स्वभाव है कि यह जिसके साथ बैठता है उसी के अनुसार रंग बदलता है और फल देता है।
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गुरु: जिसकी कुण्डली में सातवें घर में गुरु होता है, वह अपने जीवनसाथी से बहुत प्रेम करता है। सातवें घर का गुरु सुशिक्षित, विनम्र, सुशील, बुद्धिमान, समर्पित और प्रेम करने वाला जीवनसाथी दिलाता है। किन्तु विवाह में प्रायः विलंब (देरी) होता है। यदि इस गुरु पर किसी शुभ ग्रह शुक्र, चन्द्र या बुध की दृष्टि या युति हो तो यह Prem Sambandh Ke Yog के लिए अति शुभ फल देता है। किन्तु यदि इस पर किसी शुभ ग्रह का प्रभाव न हो तो गुरु का यह स्वभाव है कि यह जिस घर में होता है उस घर से संबंधित अशुभ फल देता है और जिन घरों पर पूर्ण दृष्टि डालता है उन घरों से संबंधित शुभ फल देता है; अर्थात गुरु जिस घर में हो उस घर की हानि होती है और जिन घरों पर इसकी दृष्टि पड़ती है उन घरों को लाभ होता है। गुरु अपने से पाँचवें, सातवें और नौवें घरों को पूर्ण दृष्टि से देखता है।
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शुक्र: सातवें घर का शुक्र प्रेम में थोड़ा चंचल बनाता है। परिणामस्वरूप इससे कई प्रेम होने की संभावना रहती है। यह जन्म लग्न पर सातवीं पूर्ण दृष्टि डालता है जिससे जातक मिलनसार, विनोदी होता है। सातवें घर का यही शुक्र जब Prem Sambandh Ke Yog बनाता है, तो जीवनसाथी से बहुत अच्छा प्रेम रहता है। इसके एक से अधिक विवाह होने की संभावना भी कुंडली में बन जाती है।
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शनि: यदि शनि सातवें घर में हो तो यह वैवाहिक जीवन में शक और अविश्वास की स्थिति पैदा कर देता है, जिससे आपस में मनमुटाव हो सकता है। कई बार ऐसे लोगों का अपने से अधिक उम्र के लोगों से संपर्क होता है। जीवनसाथी भी अधिक उम्र का मिल सकता है। कुछ लोगों का यह मानना है कि शनि सातवें घर में दिग्बली होकर शुभ फल भी देता है। कुण्डली में किसी भी घर में शनि + राहु की युति हो तो शापित योग बनता है। शापित योग में जन्म लेने का फल यह है कि देर से विवाह होता है साथ ही आर्थिक आत्मनिर्भरता में भी विलंब हो सकता है, जिससे बने-बनाए Prem Sambandh Ke Yog भी अधर में लटक जाते हैं।
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राहु: राहु जिस घर में होता है उस घर को पूरी तरह दूषित करता है। सातवें घर का राहु घर में कलह और क्लेश का कारक होता है। जीवनसाथी से अनबन रहती है। ऐसे जातक को धोखा देने वाला जीवनसाथी मिल सकता है तथा जातक स्वयं भी अपने जीवनसाथी को धोखा दे सकता है। यदि इस राहु पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो इसके अशुभ फलों में कमी आती है। राहु का यह मसान योग Prem Sambandh Ke Yog में सामाजिक बंधनों को तोड़ने की हिम्मत देता है। जीवनसाथी अधिक उम्र का या किसी अलग संस्कृति/जाति का भी हो सकता है।
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केतु: सातवें घर का केतु प्रेम में जातक को अंधा या पागल बनाता है। यह वैवाहिक जीवन में अनिश्चितता लाता है। चूँकि केतु धड़ भाग है और इसमें सोचने-विचारने की शक्ति नहीं होती, अतः ऐसा जातक बिना सोचे-विचारे किसी के भी प्रेम में पड़ जाता है। केतु का यह स्वभाव है कि यह जिस घर में होता है या जिस ग्रह के साथ युति करता है, उस घर या उस ग्रह की शक्ति को बहुत बढ़ा देता है, साथ ही साथ उस घर से संबंधित फल को अनिश्चितता से भर देता है। केतु जिस घर में हो उस घर के स्वामी की युति या पूर्ण दृष्टि पा ले तो उस घर से संबंधित फल देने में अति कर देता है। ऐसी स्थिति में राहु जातक के पहले घर जन्म लग्न में अर्थात तन स्थान पर तथा केतु सातवें घर अर्थात जीवनसाथी के स्थान पर होता है। चूँकि केतु राहु का आधा भाग है, अतः वह अपने आधे भाग को पूरा करना चाहता है। अपने प्रेम को पूरा करने के लिये यह सभी सामाजिक सीमायें तोड़ सकता है। चूँकि इस पर राहु की पूर्ण दृष्टि होती है और शनि, सूर्य तथा राहु अलगाववादी ग्रह माने जाते हैं, अतः यह सामान्यतः अलगाववादी अशुभ फल देता है, पर यदि इस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि या युति हो तो यह शुभ फल भी दे सकता है।
निष्कर्ष
इस प्रकार लग्न कुण्डली, चन्द्र कुण्डली और नवांश कुण्डली पर शुक्र, चन्द्र और अन्य ग्रहों के प्रभाव के कारण कुछ जन्म कुण्डलियाँ प्रेम करने वाली, कुछ झगड़ा करने वाली और कुछ सामान्य होती हैं। इसी प्रकार कुछ जन्म कुण्डलियाँ अति प्रेम और कुछ अति झगड़ा करने वाली होती हैं।
ग्रहों की स्थिति यह तय कर देती है और विभिन्न महादशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतर्दशा में यह समीकरण बदलता रहता है। वस्तुतः जन्म कुण्डली में शुक्र, चन्द्र और अन्य ग्रहों की स्थिति का सही से अध्ययन कर Prem Sambandh Ke Yog और चरित्र के बारे में सटीक तरीके से जाना जा सकता है।
FAQ: Prem Sambandh Ke Yog पर आपके सवाल
१. कुंडली में Prem Sambandh Ke Yog की पहचान सबसे पहले किस ग्रह से होती है?
भाई, लव लाइफ और आकर्षण के लिए कुंडली में सबसे पहले शुक्र और चंद्रमा की स्थिति देखी जाती है। शुक्र को प्रेम और भौतिक सुख का राजा माना जाता है, जबकि चंद्रमा मन का कारक है। अगर ये दोनों शुभ स्थिति में हैं, तो जातक के जीवन में सच्चा प्रेम टिकता है।
२. क्या शुक्र और मंगल की युति हमेशा चरित्र खराब करती है?
नहीं भाई! शुक्र और मंगल मिलकर व्यभिचारी योग तो बनाते हैं, लेकिन अगर इस युति पर देवगुरु बृहस्पति की अमृत दृष्टि पड़ जाए, तो जातक अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीख जाता है। अगर गुरु कमज़ोर हो, तभी जातक अवैध संबंधों की तरफ भागता है।
३. सातवें घर में राहु या केतु होने पर क्या प्रेम में धोखा मिलना तय है?
देखो भाई, राहु छल-कपट का ग्रह है और केतु बिना सोचे-विचारे काम कराता है। सातवें घर में इनका होना वैवाहिक और प्रेम जीवन में गलतफहमियां और अलगाव लाता है। लेकिन अगर कुंडली में लग्नेश मज़बूत हो और गुरु का कवच हो, तो इस धोखे से बचा जा सकता है।
४. मांगलिक दोष होने पर क्या प्रेम विवाह टूट जाता है?
खबरदार भाई! सातवें घर का मंगल मांगलिक दोष तो बनाता है और वैवाहिक जीवन में उग्रता लाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रिश्ता टूट ही जाएगा। सही समय पर ग्रहों की शांति और दोनों पार्टनर्स की कुंडली का मिलान करके इस दोष के प्रभाव को पूरी तरह शांत किया जा सकता है।
५. केमद्रुम योग का हमारे प्रेम संबंधों पर क्या असर पड़ता है?
भाई, जब चंद्रमा कुंडली में पूरी तरह अकेला हो (आगे-पीछे कोई ग्रह न हो), तो केमद्रुम योग बनता है। इसका सीधा असर यह होता है कि जातक प्रेम संबंधों में होने के बाद भी खुद को अंदर से बहुत अकेला और उदास महसूस करता है। मन की इस अस्थिरता को ठीक करने के लिए चंद्रमा के उपाय बहुत जरूरी हैं।
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ज्योतिषाचार्य प्रदीप कुमार Call/WhatsApp: +91-9438741641
(भुवनेश्वर, ओडिशा) जय माँ कामाख्या!